Posts

शायद तेरे जाने की वजह है

क्यों आज फिर से खामोश हूँ मैं, शायद तेरे जाने की वजह है। एक अजीब सी उदासी छायी है, शायद तेरे जाने की वजह है। जुड़ा नहीं मैं आज खुद से ही, अंदर कुछ टूट रहा है शायद। टूट कर बिखर रहा है आशियाना मेरा, कोई तूफान उठा है शायद। ना रोक सका मैं उदासी भरे उस लम्हे को, तुझसे कुछ उम्मीद थी शायद। एहसास तुझे भी रहा होगा मेरे जज़्बातों का, ये मेरी भूल थी शायद। कुछ यूं गुजरती हैं शामें मेरी, अब तेरे जाने के बाद। गुमसुम सा रहता हूँ, है बस तेरी यादों का साथ। कुछ खोया सा कुछ डूबा सा, तेरी यादों के समुन्दर में। लिए किनारे की उम्मीद कुछ यूँ बैठा हूँ। लौट कर आएगी फिर वो कश्ती, इंतज़ार किये बैठा हूँ। खामोशी भरी रात, उसपे ये बारिश का पानी। आसमाँ भी सुना रहा हो मानो कोई कहानी। तेरा भी कोई अपना गया है दूर शायद, जो यूँ रोये जा रहा है। आ बांट ले गम अपना, क्यों आंसू पे आंसू गिराए जा रहा है । आ मिल बैठें कुछ देर, इस भीगे से मौसम में। कुछ तू सुना अपनी, कुछ मैं सुनाऊँ। बहाना भी है आंसुओं को छुपाने का, कुछ तू भीगा सा है कुछ मैं भीग जाऊँ। यूँ ही चलती रहे ये रात, दिन में कुछ अजीब सा लगत...

यही किस्मत है तेरी

वही सुबह वही सबेरा, सब कुछ वही पुराना है क्यों निकलता है सूरज, अगर वही सब दोहराना है दिन भर क्या करना है, कुछ तो कमाना है रुखा-सूखा ही सही, खाकर शहर तो जाना है अगर मिल गई मजदूरी, तो खुशी खुशी घर जायेंगे आधा सामान में खर्च कर देंगे, और आधे का उधार चुकायेंगे इन्द्रदेव भी रुष्ट हुए हैं, खाद की किल्लत है भारी खेती होती राम भरोसे, क्या हुआ किस्मत को तेरी सुबह से लेकर शाम तक, इस कङकती धूप में तुम अपने बैलों के संग, दिन भर मंडराते रहते हो नंगे रहते गर्मी सहते, तब दो रोटी खा पाते हो दाम बढ़ाकर तुम्हारी फसल के, सरकार देती सहारा है लेकिन अगले ही पल, भाव देख कर दाल-आटे के लगता नहीं , यह सुख भी तुम्हारा है गरीबी,बदहाली से तंग है, फिर भी पाँचवें की तैयारी है कहता है ये मेरे वश में नहीं, ये तो अल्लाह की मरज़ी है मँहगाई-मँहगाई करते-करते, तू चिल्लाता रह जायेगा रोते-रोते इस दुनिया से, तू विदा हो जायेगा कोई नहीं जो सुन ले तेरी , शायद यही किस्मत है तेरी