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मैं अकेला हूँ और अकेला चला जा रहा हूँ।

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मैं अकेला हूँ और अकेला चला जा रहा हूँ। था कारवाँ कभी साथ मेरे, पर आज कोई नहीं। थी जो महफ़िल कभी रोशन मुझसे, आज उसमें मैं नहीं। बने हालात कुछ ऐसे, कि खुद में सिमटने को मजबूर हुआ जा रहा हूँ। मैं अकेला हूँ और अकेला चला जा रहा हूँ।। वक्त का तकाज़ा था, कि जो अपने थे वो बिछड़ गए। मैं इस कोशिश में था कि गलती की गुंजाइश ना हो, और वो गलती करके निकल गए। मैं दूर खड़ा बस देखता रहा, वक्त के साथ हर कोई बदलता रहा। मैं आज भी वहीं हूँ, और लोगों को बदलते देख यूँ मुस्कुराता जा रहा हूँ। मैं अकेला हूँ और अकेला चला जा रहा हूँ।। आज थोड़ा बेबस, थोड़ा मजबूर हूँ मैं। अपनी मंजिल की तलाश में, खुद से ही बहुत दूर हूँ मैं। जाने कब खत्म होगी ये तलाश, मेरे मुकाम की। एक धुंधली सी उम्मीद लिए, मैं बस पिघलता जा रहा हूँ। मैं अकेला हूँ और अकेला चला जा रहा हूँ।। आज कुछ कमजोर हूँ, पर लाचार नहीं। बेशक मुझे जल्दी है सपनों की, पर किसी गुनाह का मैं तलबगार नहीं। रफ़्ता रफ़्ता ही सही , कभी तो आएगा वो खुशी का मन्ज़र। अपनी ख्वाहिशों को समेटे, बस चलता जा रहा हूँ। मैं अकेला हूँ और अकेला चला जा रहा ह...

मुझे आज भी याद है तेरा साथ चलना

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मुझे आज भी याद है तेरा साथ चलना, लेकर कुछ बहाना घर से निकलना । वो गलियों से होकर चौपले पर पहुँचना। तेरे कॉलेज तक साथ-साथ चलना, मुझे आज भी याद है तेरा साथ चलना।। वो बस भी हमनवां थी, हम दोनों की गवाह थी। कुछ तेरे कुछ मेरे, पगले से यारों की एक टोली थी। एक सीट जो कभी ना बिछड़ी हमसे, सिर्फ अपनी थी। कैसे भूल जाऊँ मैं वो सब, कैसे भूल जाऊँ मैं तेरे संग बैठना। मुझे आज भी याद है तेरा साथ चलना।। वो तेरा भोलापन, वो तेरी सादगी। वो तेरा मुस्कुराना और यूँ खिलखिलाना। मैं खो चुका था तुझमें, और जी रहा था तुझको। वो सुनहरे दिन और गुलाबी रातें, वो खुद से बस तेरी बातें करना। मुझे आज भी याद है तेरा साथ चलना।। एग्जाम तो एक बहाना था, लखनऊ तक ही सही मगर तेरे साथ जाना था । तेरे साथ बिताए उन पलों का एहसास ही काफी था। और क्या चाहिए था बस तेरा साथ ही काफी था । मुझे हरदम भाता था तेरे संग यूँ घूमना, मुझे आज भी याद है तेरा साथ चलना।। मेरे लिए तेरा सबसे झगड़ना। अपने कॉलेज के टूर पे मुझे एडजस्ट करना । मेरी मार्कशीट के लिए क्लर्क से लड़ना। मेरे हर काम को यूँ तन्मयता से ...

हर उम्मीद मेरी धुआँ-धुआँ जली है

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हर उम्मीद मेरी धुआँ-धुआँ जली है। ना जाने मेरी किस्मत मुझे कहाँ ले चली है। मैं सँभला हूँ हर बार अपने दम पर यूँ गिर-गिर कर, अब तो लगता है मेरी किस्मत के दीये की लौ ही कम जली है। हर बार मेरे सपने कुछ यूँ बिखर जाते हैं। मैं समेटता हूँ किलो से और वो कुन्तलों से गिर जाते हैं। अब थक सा गया हूँ इन ख्वाबों को सहेजते-सहेजते, मैं सजाता हूँ इन्हें कई रंगों से, और ये बड़ी खामोशी से उजड़ जाते हैं। उम्मीद की एक लौ जलती है, और बुझ जाती है। किनारे पर आकर ही मेरी कश्ती, जाने क्यों पलट जाती है। मैं फिर से फँस जाता हूँ किस्मत के इस भँवर में, पिरोता हूँ सपनों को मैं जिस डोर में, वो एक झटके से टूट जाती है। ऐ किस्मत तू खामोश क्यों है, कुछ तो जवाब दे। की है मैंने जो इतनी मेहनत, उसका कुछ तो हिसाब दे। जानता हूँ तेरे भरोसे बैठना बेवकूफी है, लेकिन नींद से खाली मेरी इन रातों का कुछ तो हिसाब दे। निराशा के सागर में डूबा हूँ, और डूबता जा रहा हूँ। खो दिया है मैंने खुद को इस सफर में, और खोता जा रहा हूँ। मैं निकला था मंजिल की तलाश में एक कारवाँ लेकर, कुछ ने मुझे भुला दिया, औ...

यही किस्मत है तेरी

वही सुबह वही सबेरा, सब कुछ वही पुराना है क्यों निकलता है सूरज, अगर वही सब दोहराना है दिन भर क्या करना है, कुछ तो कमाना है रुखा-सूखा ही सही, खाकर शहर तो जाना है अगर मिल गई मजदूरी, तो खुशी खुशी घर जायेंगे आधा सामान में खर्च कर देंगे, और आधे का उधार चुकायेंगे इन्द्रदेव भी रुष्ट हुए हैं, खाद की किल्लत है भारी खेती होती राम भरोसे, क्या हुआ किस्मत को तेरी सुबह से लेकर शाम तक, इस कङकती धूप में तुम अपने बैलों के संग, दिन भर मंडराते रहते हो नंगे रहते गर्मी सहते, तब दो रोटी खा पाते हो दाम बढ़ाकर तुम्हारी फसल के, सरकार देती सहारा है लेकिन अगले ही पल, भाव देख कर दाल-आटे के लगता नहीं , यह सुख भी तुम्हारा है गरीबी,बदहाली से तंग है, फिर भी पाँचवें की तैयारी है कहता है ये मेरे वश में नहीं, ये तो अल्लाह की मरज़ी है मँहगाई-मँहगाई करते-करते, तू चिल्लाता रह जायेगा रोते-रोते इस दुनिया से, तू विदा हो जायेगा कोई नहीं जो सुन ले तेरी , शायद यही किस्मत है तेरी